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पॉलिटिकल पापा

Political Papa: देश की मौजूदा हालात और राष्ट्र निर्माण की नयी राह दिखा गया पॉलिटिकल पापा

पॉलिटिकल पापा: मंच पर अभिनेता संवाद बोल रहा था सन्नाटा पसरा हुआ था।इन झिंगुरुओं की आवाज से मुझे सख्त नफ़रत है’, ‘तुम लोग मुझे सुपर हीरो के रूप में देखना चाहते हो तो मैं दिख रहा हूँ,’ मेरे बोलने का समय हो गया है, मैं क़लम से वर्तमान बनाता बिगाड़ता हुँ, मैं बोलूंगा पश्चिम से सूरज निकलता है तो निकलेगा , दिशाएं तो होती ही नही है दुनिया गोल है मुम्बई में एमकोका , यूपी में यूपीकोका सोंचो पंजाब में लग गया तो पीकोका, लोग ठहाके लगा रहे थे तो ,तो अचानक उन ठहाको पर विराम भी लग रहा था और यह सब हो रहा था लखनऊ के राय उमानाथ बली प्रेक्षागृह में मंचित होने वाले नाटक ‘पोलिटिकल पापा’ में वहाँ पिन ड्राप सन्नाटा यह साफ दर्शा रहा था की देश की वर्तमान राजनीति की दशा,दुर्दशा। दिशा क्या है?

पॉलिटिकल पापा

कथानक एवं पात्र परिचय

तमाम सवालों के जवाब तलाशने की कोशिश करता नाटक ‘पोलिटिकल पापा ‘ के माध्यम से की गयी जिसमें दो किरदार पापा जो एक बुजुर्ग व्यक्ति और एक युवा पब्लिक जो जनता का नेतृत्व करता है .

पूरा नाटक देखे लाइव:

#FB_Live #Political_Papaदेश की मौजूदा हालात को बयां करता हिंदुस्तानी नाटक #पोलिटिकल_पापा।Actor #Shakti_Mishra and #Akshat_MishraWriten and Director by #Mukesh_Verma

Posted by The Telegraph Hindi on Saturday, December 23, 2017

 

नाटक के कथानक पर एक नज़र डाले तो युवा पब्लिकल देश की वर्तमान राजनीति की मुख्यधारा से जुड़ने, प्रशिक्षण के लिए पापा के पास आता है , जो स्वयं को राजनीति का पापा मानता है , उसका मानना है वह कलम से इतिहास बनाता और बिगाड़ता है , वह युवा लड़के को तमाम सवालों में उलझाकर कर रखता है और अपनी हर बात को मनाने पर बल देता है ।

पॉलिटिकल पापा

लेकिन उन आवाजों से भी डरता है जो उसकी बात नही मानते उसे खतरा उन्ही से लगता है पापा उन्हें झींगुर कह कर संबोधित करता है , वह लगातार युवक को बताने की कोशिश करता है देश मे विकास हो रहा डिजिटल मीडिया पर सब दिख रहा लेकिन युवा पब्लिकल कहता है ,’यह तो यहाँ है धरातल पर क्या है’, सवाल जवाबो के साथ नाटक आगे बढ़ता है और इन सवाल जवाबों के बीच पापा को यही लगता है पब्लिकल जो कह रहा है वह सच है , बतौर क़लमकार उसने देश के हालातों को प्रभावित किया है और उसी ने बापू का चश्मा चोरी कर लिया विक्षिप्त होकर वह स्वंय को मौत के हवाले कर देता है, और प्राण त्यागते हुए लोगो से यही कहता है कोई जरूरी नही सफेद चादर के नीचे जो व्यक्ति लेता हुआ है वह सही हो इसलिए जिसे जिसके हाँथ में देश की प्रभावशाली बागडोर सौपने वाले है उसका आंकलन करना जरूरी है ।

पॉलिटिकल पापा

नाटक इसी संदेश के साथ समाप्त होता है और वही अपने प्रभावशाली अभिनय से दोनों कलाकार शक्ति मिश्रा ,और अक्षत मिश्रा सफल भी होते है आपको बता दे मंच पर पिता और पुत्र का किरदार निभाने वाले कलाकार वास्तव में भी पिता पुत्र है वही नाटक में क्रियेटिव निर्देशन सिद्धार्थ श्रीवास्तव, विष्णु, नीरज मिश्रा, रितेश सिंह, वस्त्र विन्यास (नूपुर मिश्रा ) मेकअप मधु सैनी ,प्रकाश संरचना मुस्कान गोस्वामी( MPSD) योगेंद्र (NSD), व्यवस्था मंच व्यवस्था राज बिष्ठ, पीयूष गुप्ता , प्रताप राठौर ,विश्वनीत श्रीवास्तव,दीपिका ठाकुर,घनश्याम चौरसिया, शेखर श्रीवास्तव ,सुरेश पटेल ज़फरुल खान, शुभम पांडेय, विवेक मिश्रा विष्णु आदि की रही । नाटक का अगला मंचन 25 दिसम्बर 2017 को नेशनल ड्रामा फेस्टिवल में बिहार के सिवान टाउन हॉल में होना है नाटक में बतौर अथिति दर्शक दीर्घा में विवेक तिवारी , चंद्रसेन वर्मा, सुशील दुबे, विनोद मिश्र , रवि श्रीवास्तव ( डिप्टी लेबर कमिश्नर ) गौरव श्रीवास्तव ( EPFO) , विजय वास्तव (वरिष्ठ रंगकर्मी) गड़मान्य लोग मौजूद रहे ।

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